शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

भ्रष्टाचार में गले तक डूबा हूँ,
अत्याचार करने में सबका बाप हूँ |
झूटे आश्वासन देता हूँ,
सेवा की नाम पर मेवा खता हूँ |
नेता हूँ भाई नेता हूँ......

विकृत इतिहासबोध की उपज

विकृत इतिहासबोध की उपज

Oct 21, 12:32 am
जीवंत इतिहासबोध में ही राष्ट्र का अमरत्व है और विकृत इतिहास में राष्ट्र की मृत्यु। श्रीराम भारत के मन का रस और छंद हैं। गांधी के सपनों वाले 'रामराज्य' के राजा हैं। वे इतिहास हैं और श्रद्धा भी। वाल्मीकि रामायण इन्हीं राम की गाथा है। मा‌र्क्सवादी चिंतक रामविलास शर्मा ने भी रामायण को इतिहास और महाकाव्य बताया है। वाल्मीकि रचित रामायण का भूगोल-नदियां, नगर और वन, पर्वत इतिहास सिद्ध हैं। तमिल की 'कंब-रामायण' तेलुगू की 'रंगनाथ रामायण', कन्नड़ की 'पाम्पा रामायण' बंगला की कृतिवास रामायण आदि के श्रीराम प्रेरित करते हैं। तुलसी की रामचरित मानस के राम 'मंगल भवन अमंगल हारी' हैं। श्रीराम भारतीय संस्कृति के महानायक हैं। बावजूद इसके दिल्ली विश्वविद्यालय के बच्चों को कई बरस से श्रीराम, सीता और हनुमान के चरित्र को कलंकित करने वाला पाठ पढ़ाया जा रहा था। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद सहित कई संगठनों ने 2008 में विरोध प्रदर्शन किया। मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। कोर्ट के निर्देश पर विशेषज्ञों की समिति ने अध्ययन किया, विशेषज्ञ समिति ने विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद के समक्ष रिपोर्ट रखी। परिषद ने एके रामानुजन के लिखे निबंध 'थ्री हंड्रेड रामायण फाइव एगजांपल्स एंड थ्री थॉट्स आन ट्रांसलेशन' को पाठ्यक्रम से निकाल दिया। लेकिन कुछ शिक्षक व इतिहासकार इसे पाठ्यक्रम में जोड़ने की मांग पर अड़े हैं।
विवादित निबंध में 'रावण के गर्भ' का उल्लेख है। सीता को रावण की छींक से पैदा रावण पुत्री बताया गया है। कहा गया है कि इन्हीं सीता को रावण और लक्ष्मण आकर्षित करते थे कि सीता राम के प्रति निष्ठावान नहीं थीं। हनुमान राम के पिट्ठू थे। निबंध में इंद्र की देह के बारे में अति अश्लील बातें कही गई हैं। इन कथाओं का उद्देश्य क्या है? बीए के 17-21 वर्षीय छात्र 'रावण को गर्भवान' कैसे जानेंगे। मूलभूत प्रश्न है कि ऐसी मनगढ़ंत कल्पनाओं का इतिहास से क्या संबंध है? इतिहास यथातथ्य अतीत होता है। इतिहास लेखन की तमाम शैलियां हैं किंतु इतिहास संकलन की किसी भी शैली में ऐसी कपोल कल्पनाएं नहीं होतीं। इतिहास विज्ञान होता है। जो स्वयंसिद्ध है, जो यथातथ्य घटित हुआ है, वही इतिहास है। ऐसे तथ्यहीन विवरण आखिरकार इतिहास क्यों हैं?
स्वयंभू विद्वान इस निबंध में छात्रों की चिंतन प्रणाली का विकास देख रहे थे। रामानुजन की इस कल्पना में 'सोच-विचार और चिंतन' की गुंजाइश कहा है? 'वाल्मीकि रामायण' सोच-विचार और विवेक की सामग्री देती है। वह श्रीराम की मानवीय सीमाएं बताती है, उनमें मौजूद दिव्य तत्वों का विवेचन भी करती है। 'रामायण' में भौतिकवाद है, कपिल का सांख्य दर्शन है, कणाद का परमाणुवाद है, योग के सूत्र हैं, जबर्दस्त सांसारिकता है, राज-समाज संचालन के सूत्र हैं, वेदांत दर्शन है। विश्व की आधुनिक दार्शनिक प्रणालियों के सूत्र भी 'रामायण' में हैं। रामानुजन ने हड़बड़ी में 300 रामायणें गिनी हैं। 'रामायण' एक है। यही मूल कथा का आधार है। वाल्मीकि रामायण की कथा ने भारत के अलावा चीन, जापान, इंडोनेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया, रूस, लाओस आदि के रचनाकारों को भी प्रेरित किया। चीनी 'त्व पाओत्सांग किंग' के प्रथम भाग में दशरथ पुत्र राम की कथा है। रामकथा और रामायण अंतरराष्ट्रीय आकर्षण है। 'रामायण' आस्था नहीं विवेक जगाती है।
भारतीय विवेक का विकास वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्क प्रतितर्क से हुआ। रामानुजम के समर्थक कथित विद्वान रामानुजम से भी बड़ा अजूबा हैं। वह अल्पवयस्क बच्चों को इतिहास की कक्षा में भी 'अश्लील गल्प कथा' पढ़ाने के समर्थक है। मूलभूत प्रश्न है कि ऐसी जानकारियों से भावी पीढ़ी को क्या लाभ हो रहा था? पूरा पाठ संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19, 21 व 51(ए) का उल्लंघन है। यह भारतीय दंड विधान की धारा 153, 292, 295 व 505 के अधीन अपराध भी है। निबंध शिक्षा पर राष्ट्रीय नीति को लेकर गठित संसदीय समिति (1967) व पाठ्य पुस्तकों के लिए प्रो. केजी सैय्यद की अध्यक्षता में गठित समिति सहित कई समितियों की सिफारिशों के विपरीत है।
भारतीय राष्ट्रभाव और विवेक को नष्ट करने का एजेंडा बहुत पुराना है। भारत प्राचीन आर्य भूमि है। सिंधु सभ्यता प्राचीन वैदिक सभ्यता का विस्तार थी, लेकिन ब्रिटिश साम्राज्यवादी षड्यंत्रों के चलते 1921-22 से हमारे पूर्वज आर्यो को विदेशी हमलावर बताया गया। ऐसे लोग भारत के विशाल जनसमूह को विदेशी बताते हैं। ऐसे लोग ही विचार अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर जम्मू-कश्मीर की जनता के अलग हो जाने की पैरवी करते हैं। कुछेक कश्मीर विवाद में पाकिस्तान को भी पक्ष बनाने की पैरवी करते हैं। शिव ऋग्वेद के देवता हैं लेकिन स्वयंभू विद्वानों ने उन्हें आयातित देव बताया। भारतीय संस्कृति प्राचीन वैदिक संस्कृति का विस्तार है। लेकिन ये लोग भारत में तमाम संस्कृतियां बताते हैं। वे 'यथार्थ इतिहासबोध' को ही नष्ट करने पर आमादा हैं। प्राचीन भारत में सार्थक इतिहासबोध था। विश्व के प्राचीनतम ज्ञान रिकार्ड ऋग्वेद में भी इतिहासबोध है।
'वैदिक इंडेक्स' (खंड 1) के अनुसार श्रीराम के पूर्वज इक्ष्वाकु ऋग्वेद काल के एक राजा थे। इक्ष्वाकु का उल्लेख ऋग्वेद और अथर्ववेद में है, रामायण में भी है। अमरकोष के अनुसार इतिहास का प्राचीन नाम 'पुरावृत्त' था। कालिदास ने 'रघुवंश' में बताया है कि विश्वामित्र ने राम को 'पुरावृत्त' सुनाया था। भवभूति कालिदास और राजशेखर ने रामायण को इतिहास बताया है। यहां बहुसंख्यक समुदाय की आस्था का ही प्रश्न नहीं है, बुनियादी सवाल इतिहास की सामग्री का ही है। विद्वतजन बताएं कि इतिहास होता क्या है? क्या यह तथ्यहीन कल्पना होता है? क्या नई पीढ़ी के ज्ञान, संस्कार और प्रज्ञा निर्माण में इतिहास की कोई भूमिका है? अगर है तो संपन्न और प्रज्ञावान राष्ट्र का हमारा सपना क्या है? क्या हम संस्कृति विरोधी आत्महीन तरुण भारत चाहते हैं या दयानंद अरविंद, विवेकानंद और गांधी प्रेरित राष्ट्रीय वैशिष्ट्याभिमानी भारत? भारत के प्रति आत्मीय निष्ठा वाले युवामन के लिए एक सार्थक इतिहासबोध की ही आवश्यकता है। संविधान निर्माताओं ने संविधान की मूल प्रति पर श्रीराम और श्रीकृष्ण के चित्र लगाए थे। मौलिक अधिकारों वाले भाग 3 में श्रीराम की लंकाविजय का चित्र था। विजयदशमी की सायं हरेक बरस प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति दिल्ली की रामलीला में उपस्थित होते हैं। क्या ये श्रीराम राष्ट्र, संविधान और प्रधानमंत्री के आदर वाले हैं या रामानुजन के द्वारा पिटे राम हैं। आश्चर्य है कि श्रीराम की पिटाई करने वाले विद्वान का नाम भी रामानुजन ही है।
[हृदयनारायण दीक्षित: लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं]
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मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

2 – जी और लेटर डिप्लोमेसी : एक नज़र प्रधानमंत्री की भूमिका पर

2 – जी और लेटर डिप्लोमेसी : एक नज़र प्रधानमंत्री की भूमिका पर

मीडिया में फौरी तौर पर भले ही यह नज़र आ रहा हो कि प्रणब मुखर्जी और पी चिदंबरम के बीच विवाद खत्म हो गया है, पर हकीकत यह है कि मनमुटाव की चिंगारी अभी भी सुलग रही है. प्रणब मुखर्जी बेहद आहत और क्षुब्ध हैं. दिग्गज कांग्रेसियों द्वारा उन्हें मनाने की कोशिशें जारी हैं, पर प्रणब मुखर्जी की तिलमिलाहट कम नहीं हो रही है. उधर पी चिदंबरम का आवेश भी अपनी जगह कायम है. मतलब यह कि सरकार की मुसीबतें कम नहीं हुई हैं. हालांकि संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस और तमाम बयानों से देश को भ्रमित करने की जुगत ज़रूर की जा रही है कि ऑल इज वेल. पर ऑल इज नॉट वेल, क्योंकि पी चिदंबरम को अपने सहयोगियों और सरकार पर भरोसा नहीं है. उनका अंदेशा अभी भी बरक़रार है कि उन्हें फंसाने की साज़िश उनके अपने ही कर रहे हैं. लिहाज़ा, वह अपने वक़ीलों से लगातार मशविरा कर रहे हैं. कुछ दिनों पहले पी चिदंबरम ने अपने वकील से कहा भी था कि कुछ लोग आलमारी से कपड़ा निकालते हैं, लेकिन मैंने कपड़ा निकाला तो पूरी आलमारी गिरा दूंगा. जाहिर है, मौजूदा दौर सरकार के लिए बेहद नाजुक है. वह अपने ही दो वरिष्ठतम मंत्रियों की गिरफ्त में फंस चुकी है. आ़खिर चूक कहां हुई, जिससे सरकार बेबस हो गई? पढ़िए इस रिपोर्ट में…
खबर आई कि प्रणब मुखर्जी ने अपने नोट से चिदंबरम को कठघरे में ला खड़ा किया. इसके बाद एक और खबर आई कि यह नोट तो पीएमओ के कहने पर तैयार किया गया था. दर्जनों बैठकों और कई मंत्रालयों के विचार इस नोट में शामिल हैं. सवाल यह है कि क्या चिदंबरम पर निशाना साधने के लिए किसी ने किसी के कंधे का इस्तेमाल तो नहीं किया है? सवाल यह भी है कि कहीं निगाहें चिदंबरम पर और निशाना कहीं और तो नहीं है? आ़खिर इस पूरे मामले में पीएमओ की क्या भूमिका है? फिर पीएमओ और कैबिनेट के मुखिया के नाते इस पूरी लेटर डिप्लोमेसी के पीछे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की क्या भूमिका है? 2-जी के इस पूरे प्रकरण से एक बात सा़फ हो जाती है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अराजनीतिक समझने वाले लोगों को अब एक बार फिर से अपना राजनीतिक ज्ञान जांच लेना चाहिए. पीएमओ के आदेश पर यह नोट तैयार होता है. तो पीएमओ को यह आदेश किसने दिया होगा?
बहरहाल, इस पूरे प्रकरण से एक बात सा़फ हो जाती है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अराजनीतिक समझने वाले लोगों को अब एक बार फिर से अपना राजनीतिक ज्ञान जांच लेना चाहिए. पीएमओ के आदेश पर यह नोट तैयार होता है. तो पीएमओ को यह आदेश किसने दिया होगा? ज़ाहिर है, खुद प्रधानमंत्री ने. अब सवाल यह है कि सरकार और कैबिनेट के मुखिया होने के नाते क्या मनमोहन सिंह को यह बात नहीं पता थी कि इस तरह के नोट से उनके ही सहयोगियों पर सवाल उठेंगे और यह सब कुछ सरकार और कांग्रेस के लिए ठीक नहीं रहेगा.
ज़ाहिर है, खुद प्रधानमंत्री ने. अब सवाल यह है कि सरकार और कैबिनेट के मुखिया होने के नाते क्या मनमोहन सिंह को यह बात नहीं पता थी कि इस तरह के नोट से उनके ही सहयोगियों पर सवाल उठेंगे और यह सब कुछ सरकार और कांग्रेस के लिए ठीक नहीं रहेगा तथा विपक्ष को बैठे-बैठाए एक और हथियार मिल जाएगा. ज़ाहिर है, जो आदमी 8 साल से इस देश का प्रधानमंत्री हो, उसे यह सब तो मालूम होगा ही. फिर भी पीएमओ ने यह आत्मघाती क़दम क्यों उठाया? स़िर्फ एक पत्र लीक होने से कांग्रेस को आज बैकफुट पर आना पड़ा है. कांग्रेस अध्यक्ष तय नहीं कर पा रही हैं कि इस पूरे प्रकरण का सटीक समाधान क्या हो सकता है और इस सबके बीच मनमोहन सिंह के पास खोने के लिए कुछ नहीं है. सर्वविदित तथ्य है कि प्रणब मुखर्जी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे. इस इच्छा में कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन प्रणब दा यह समझ चुके हैं कि उनके हाथ से यह मौका निकल चुका है. कांग्रेस के भीतर इस व़क्त मुक़ाबला स़िर्फ और स़िर्फ राहुल गांधी और मनमोहन सिंह के बीच है. यूपीए-2 का कार्यकाल 3 साल बचा हुआ है और मनमोहन सिंह के पास अभी सबसे बड़ा टास्क यही है कि वह किसी तरह ये तीन साल गुज़ार दें. उधर कांग्रेस का एक धड़ा तीन साल तक इंतजार के लिए तैयार नहीं है.
लेटर डिप्लोमेसी भी कमाल की चीज होती है.अच्छों-अच्छों की पोल खुल जाती है. हालत यह है कि चिदंबरम का भविष्य और सरकार की साख खतरे में है. बहरहाल, एक मुद्दा ऐसा है, जिस पर बात नहीं हो रही है और वह यह कि आ़खिर इस पूरे प्रकरण में पीएमओ यानी प्रधानमंत्री कार्यालय और खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भूमिका क्या है? दरअसल, जब चिदंबरम प्रकरण ने जोर पकड़ा तो प्रणब मुखर्जी ने मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को एक पत्र भेजकर बताया कि जिस नोट पर इतना बवाल मचा है, वह दरअसल पीएमओ यानी प्रधानमंत्री कार्यालय के आदेश पर तैयार किया गया और उसे कई मंत्रालयों ने मिलकर तैयार किया. पत्र में बताया गया कि वित्त मंत्रालय की ओर से 25 मार्च, 2011 को चिदंबरम के संबंध में जो नोट भेजा गया था, उसे पीएमओ, कैबिनेट सचिवालय और कानून, दूरसंचार एवं वित्त मंत्रालय ने मिलकर तैयार किया था.
दिलचस्प तथ्य यह है कि नोट बनाने के लिए ज़रूरी सूचनाएं खुद पीएमओ के अधिकारियों ने मुहैय्या कराई थीं. दरअसल, पीएमओ 2-जी मामले की पूरी जानकारी चाहता था. इसलिए अलग-अलग मंत्रालयों को मिलकर यह नोट तैयार कराने के लिए कहा गया था. इस नोट में वित्त मंत्रालय की ओर से स़िर्फ 12 पैराग्राफ की सूचनाएं ही उपलब्ध कराई गई थीं और 14 पैराग्राफ विभिन्न मंत्रालयों की ओर से. अंत में 35 पैराग्राफ का नोट तैयार हुआ, जिसे कैबिनेट सचिवालय ने वित्त मंत्रालय की सहमति और हस्ताक्षर के लिए प्रणब मुखर्जी के पास भेजा. हालांकि, प्रणब मुखर्जी ने इस पर अपनी सहमति देने से मना कर दिया और अंत में यह नोट बिना हस्ताक्षर के पीएमओ के पास गया. सबसे बड़ी बात यह कि अंत में पीएमओ से ही यह नोट आरटीआई के ज़रिए बाहर भी आया.
इस दस्तावेज के मुताबिक़, वित्त मंत्रालय ने कहा है कि वित्तमंत्री रहते हुए पी चिदंबरम ने यदि 2-जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के लिए जरूरी कोशिश की होती तो लाइसेंस वितरण के बदले सरकार को नुकसान न होता, उसे रोका जा सकता था. दरअसल, इस नोट में 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन से संबंधित विभिन्न मंत्रालयों के बीच बैठक और उनके बीच पत्रों के आदान-प्रदान का विस्तृत ब्योरा है. इस नोट को वित्त मंत्रालय, कैबिनेट सचिवालय, दूरसंचार मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारियों ने मिलकर तैयार किया है. प्रणब मुखर्जी के मुताबिक, यह नोट इसलिए तैयार किया गया था कि अगर 2-जी मामले में किसी विभाग के अधिकारी की गवाही हो तो उसमें कोई परिवर्तन न हो और सभी की गवाही एक जैसी हो. प्रणब मुखर्जी के मुताबिक़, नोट तैयार करने के पूरे घटनाक्रम पर कैबिनेट सचिवालय की निगरानी थी. पीएमओ के अधिकारी और पूर्व कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर भी नोट बनाने की इस पूरी प्रक्रिया में शामिल थे. इसके लिए इस साल जनवरी से लेकर मार्च तक करीब 22 बैठकें हुईं.
दिलचस्प तथ्य यह है कि नोट बनाने के लिए ज़रूरी सूचनाएं खुद पीएमओ के अधिकारियों ने मुहैय्या कराई थीं. दरअसल, पीएमओ 2-जी मामले की पूरी जानकारी चाहता था. इसलिए अलग-अलग मंत्रालयों को मिलकर यह नोट तैयार कराने के लिए कहा गया था. इस नोट में वित्त मंत्रालय की ओर से स़िर्फ 12 पैराग्राफ की सूचनाएं ही उपलब्ध कराई गई थीं और 14 पैराग्राफ विभिन्न मंत्रालयों की ओर से. अंत में 35 पैराग्राफ का नोट तैयार हुआ, जिसे कैबिनेट सचिवालय ने वित्त मंत्रालय की सहमति और हस्ताक्षर के लिए प्रणब मुखर्जी के पास भेजा. हालांकि, प्रणब मुखर्जी ने इस पर अपनी सहमति देने से मना कर दिया और अंत में यह नोट बिना हस्ताक्षर के पीएमओ के पास गया. सबसे बड़ी बात यह कि अंत में पीएमओ से ही यह नोट आरटीआई के जरिए बाहर भी आया. इसी नोट के ज़रिए पी चिदंबरम का नाम 2-जी घोटाले में आ गया और दिल्ली का राजनीतिक पारा अचानक काफी बढ़ गया. अनुभवी प्रणब मुखर्जी के एक पत्र ने कांग्रेस से लेकर सरकार तक की मुश्किलें बढ़ा दीं. दूसरी ओर इस पत्र के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में सुब्रह्मण्यम स्वामी ने एक याचिका भी डाली है, जिसमें 2-जी घोटाले में चिदंबरम की भूमिका की जांच कराने की मांग की गई है. सुब्रह्मण्यम स्वामी 2-जी घोटाले में याचिकाकर्ता हैं. उन्होंने वित्त मंत्रालय की ओर से पीएमओ को लिखी चिट्ठी सुप्रीम कोर्ट में पेश की है. उनका आरोप है कि अगर तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम चाहते तो 2-जी घोटाला न होता. याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है.
बहरहाल, कोर्ट से क्या आदेश आता है और चिदंबरम का भविष्य क्या होगा, यह तय करने का व़क्त अभी नहीं है, लेकिन कांग्रेस को मिशन 2014 या उससे पहले, यदि मध्यावधि चुनाव संभव हुआ, की तैयारी का़फी सोच-समझ कर करनी होगी. 2-जी के बहाने यह लड़ाई अब कांग्रेस के भीतर भी चरम पर पहुंच गई है. मनमोहन सिंह अब स़िर्फ अर्थशास्त्री नहीं रहे, वह एक परिपक्व राजनीतिज्ञ भी बन चुके हैं. ऐन मौके पर अगर फिर से कोई नया खेल हुआ तो कांग्रेस के भविष्य का भविष्य भी अनिश्चित हो सकता है.

तुरुप का पत्ता

सवाल यह है कि इस पूरे मामले में तुरुप का पत्ता किसके पास है? प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री या सुब्रह्मण्यम स्वामी के पास, जिन्होंने सूचना के अधिकार के तहत प्रणब मुखर्जी का पत्र हासिल किया था. सुब्रह्मण्यम स्वामी और मनमोहन सिंह बहुत गहरे दोस्त हैं. जब चंद्रशेखर जी प्रधानमंत्री थे, तब सुब्रह्मण्यम स्वामी उस सरकार में मंत्री थे और मनमोहन सिंह उस सरकार में तत्कालीन प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार थे. उन्हें यह नहीं मालूम कि सुब्रह्मण्यम स्वामी दोधारी तलवार हैं. सुब्रह्मण्यम स्वामी कांग्रेस के ऊपर भी वार करेंगे और करुणानिधि के लोगों पर भी वार करेंगे. सुब्रह्मण्यम स्वामी एक ऐसे राजनेता हैं, जिन्होंने अकेले खड़े होकर 2-जी स्पेक्ट्रम की लड़ाई लड़ी. तो क्या तुरुप का पत्ता प्रधानमंत्री कार्यालय से निकल कर सुब्रह्मण्यम स्वामी के पास आ गया है? एक और संस्था है, जिसके निर्णय से कुछ भी पलट सकता है.

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

वाः अन्ना वाः !!!!कांग्रेस के साथ सुलह की तरफ अन्ना!





नई दिल्ली [राजकिशोर]। एक तरफ जहां कांग्रेस टीम अन्ना पर प्रहार कर रही है, वहीं केंद्र सरकार ने गुपचुप तरीके से अन्ना हजारे के रौद्र रूप को शांत करने के लिए कोशिशें तेज कर दी हैं। अन्ना आंदोलन से पूरे देश में सरकार के खिलाफ बने माहौल को पलटने के लिए कांग्रेस के मध्यस्थों ने अब उनके साथ संवाद के नए गलियारे भी खोल दिए हैं।
नई टीम अन्ना यानी अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण को किनारे कर सरकार के मध्यस्थों ने अन्ना की पुरानी टीम के साथ संवाद तेज कर दिया है। अब यह सरकारी कोशिशों का नतीजा है या फिर सेहत से जुड़ा मसला कि अन्ना ने 15 अक्टूबर से उत्तर प्रदेश की यात्रा पर फिलहाल मौन साध लिया है।
नई दिल्ली में शुक्रवार को सिविल सोसाइटी की कोर कमेटी में भी अन्ना के न आने के दूरगामी निहितार्थ देखे जा रहे हैं। साथ ही अब अन्ना की नई टीम की जगह उनकी पुरानी टीम ही ज्यादा सक्रिय नजर आने लगी है।
विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक अन्ना के सामने राष्ट्रपति का प्रस्ताव भी रखा गया है। अन्ना ने इसे सार्वजनिक रूप से ठुकरा दिया है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक यह अध्याय पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है। उनके पुराने करीबी लोगों ने कांग्रेस नेतृत्व से तीन सवाल जानने चाहे हैं। पहला कि राष्ट्रपति चुनाव के दौरान कांग्रेस के पास कितने वोट होंगे। उनके जीतने की कितनी संभावना होगी और साथ ही दूसरी पार्टियों के संभावित उम्मीदवार कौन हो सकते हैं।
हालांकि, अन्ना बगैर मजबूत लोकपाल के किसी भी कीमत पर मानने को तैयार नहीं हैं। इस बारे में सरकार की तरफ से तैयारी है कि अगले कुछ महीनों के भीतर सरकार भ्रष्टाचार से निपटने के लिए कुछ ठोस कदम उठाएगी। इस पर अन्ना संतोष जताएंगे। अगर यह बातचीत तय हो जाती है तो अन्ना हजारे को फिलहाल अपने तेवर नरम रखने होंगे। कांग्रेस उनकी मजबूरी को समझते हुए उन्हें यह तो नहीं कहेगी कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ न बोलें, लेकिन चुनावों के दौरान पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोई भी कोशिश उन्हें तुरंत बंद करनी होगी।
सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे मामले में महाराष्ट्र के लॉबिस्ट अभिनंदन थोराट महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। चिंतनग्रुप नाम से इमेज मेकिंग एजेंसी चलाने वाले थोराट विलासराव देशमुख के जनसंपर्क का काम देखते हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय राजनीति में महाराष्ट्र के ही कई दूसरे बडे़ कद्दावर नेताओं से भी थोराट के बहुत करीबी संबंध हैं। हालत यह है कि इस दौरान वे कम से कम तीन बार अन्ना के साथ दो-ढाई घंटे तक बंद कमरे में बैठक कर चुके हैं। थोराट ने पहले भी महाराष्ट्र में चले अन्ना के आंदोलन खत्म करवाने में भूमिका निभाई।
अन्ना की नई टीम पर थोराट ने जहां प्रहार किया है, वहीं रालेगण सिद्धि में अन्ना के सबसे करीबी लोगों से इनके संबंध बहुत मधुर हैं। इनमें अन्ना के निजी सहायक सुरेश पठारे और दादा पठारे व अनिल शर्मा भी शामिल हैं। सुरेश पठारे और दादा पठारे पिछले दिनों थोराट के आमंत्रण पर गोवा और मुंबई के पर्यटन पर भी गए। साथ ही आइफोन और टैबलेट कंप्यूटर जैसे उपहार भी इन्हें मिले हैं। इस बाबत सुरेश पठारे ने कहा कि कार्यालय के लिए चिंतन ग्रुप ने आइफोन जरूर दिया है। पठारे ने एनसीपी के एक मंत्री रामराज लिंबा के साथ थोराट की मुलाकात की पुष्टि भी की। अन्ना के उत्तर प्रदेश दौरे पर उन्होंने कहा कि अभी कुछ तय नहीं हो सका है। अन्ना की नई टीम से मतभेद की बात को जहां पठारे ने खारिज किया, वहीं अरविंद केजरीवाल ने इस बारे में कुछ भी बोलने से मना कर दिया।
क्या कर सकते हैं अन्ना
-15 अक्टूबर से उत्तर प्रदेश की यात्रा न करें, जिसका एलान तीन अक्टूबर को किया था
-इसी तरह देशभर की यात्रा के अपने कार्यक्रम को भी रद करें, जिसका एलान रामलीला मैदान से किया था
-आने वाले चुनाव में किसी भी जगह कांग्रेस के उम्मीदवार के खिलाफ प्रचार न करें
-कांग्रेस विरोधी छवि वाले अपने साथियों प्रशांत भूषण, अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी से दूरी रखें


महिषासुर की शहादत और मैकाले का जन्मदिन मनाएंगा जेएनयू

महिषासुर की शहादत और मैकाले का जन्मदिन मनाएंगा जेएनयू

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महिषासुर की शहादत और मैकाले का जन्मदिन मनाएंगा जेएनयू
देश का प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जेएनयू अपनी गौरवशाली लोकतांत्रिक परंपरा में एक और अध्याय जोड़ने जा रहा है. अब वह महिषासुर का शहादत दिवस और मैकाले का जन्मदिन भी मनाएगा. यह महिषासुर कोई और नहीं बल्कि वही प्रतीक रूप राक्षस है जिसका देवी दुर्गा ने चंडी रूप में वध किया था. दिल्ली से प्रकाशित होनेवाली एक दलित पत्रिका में चंडी को रंडी बताकर महिषासुर को शहीद का दर्जा दिये जाने के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कई छात्र संगठनों ने तय किया है कि वे विश्वविद्यालय परिसर में महिषासुर का शहादत दिवस मनाएंगे. और मैकाले के जन्मदिन 25 अक्टूबर को मैकाले को याद करेंगे.
दशहरा समाप्त होने के बाद इन छात्र संगठनों ने जेएनयू प्रशासनिक परिसर के बाहर एक प्रदर्शन भी किया और तथाकथित हिन्दूवादी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को घेरते हुए कहा कि वह जेएनयू में मनुवाद लाने की कोशिश कर रही है. प्रदर्शन में शामिल छात्र संगठनों के प्रतिनिधियों ने कुलपति से मुलाकात कर पिछले दिनो एआइबीएसएफ के अध्‍यक्ष जितेंद्र कुमार, उपाध्‍यक्ष विनय कुमार व कार्यकारिणी सदस्‍य मुन्‍नी कुमारी पर हमले करने वाले एबीवीपी के कार्यकर्ताओं को यूनिवर्सिटी से बाहर करने की मांग भी की.
गौरतलब है कि जेएनयू में दुर्गापूजा के बाद से ही लगातार अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद तथा ऑल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंट फोरम के बीच तनाव बना हुआ है। दुर्गापूजा के दिन एआाईबीएसएफ ने जेएनयू परिसर में 'फारवर्ड प्रेस' में छपा लेख 'दुर्गा: किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन' का पोस्‍टर बनाकर लगाया था। बिहार के लेखक व राजनेता प्रेमकुमार मणि ने अपने इस लेख में महिषासुर को भारत का मूलनिवासी (ओबीसी) बताया है तथा कहा है कि बंग देश में दुर्गा को वेश्‍याएं अपने कुल का बताती हैं। इससे नाराज एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने न सिर्फ इस लेख के आधार पर बनाया गया और एआईबीएसफ के पोस्‍टर फाड डाला बल्कि उनके कार्यकर्ताओं पर हमला भी किया। 
एबीवीपी का आरोप है कि एआईबीएसएफ ने हिंदू देवी दुर्गा का अपमान किया है जबकि एआईवीएसएफ का कहना है जिस पत्रिका में यह लेख छपा है, उससे देश और विदेश के कई बडे एकेडमिशियन कांचा अइलैया, टॉम वुल्‍फ, गेल ऑमवेट आदि जुडे हैं। हमने यह लेख उक्‍त पत्रिका से ले लिया है तथा हम इस लेख के तथ्‍यों से सहमत हैं। उन्‍होंने कहा कि हम दुर्गा को दलित पिछडों का संहार करने वाली देवी मानते हैं तथा महिषासुर को वंचित तबकों का नायक। वाम छात्र संगठन इस पूरे मामले में एआइबीएसएफ के साथ हैं। उन्‍होंने इस अवसर पर, फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित एक लेख के आधार पर 25 अक्‍टूबर को लार्ड मैकाले की जयंती मनाने की भी घोषणा की है।  
उधर, फारवर्ड प्रेस के संपादक (हिंदी) प्रमोद रंजन ने कहा कि हमारी पत्रिका इस विवाद में शामिल नहीं है। हमने यह लेख तथ्‍यों के आधार पर प्रकाशित किया है। इस का छात्र कैसे उपयोग कर रहे हैं, यह उनकी अपनी विचारधारा पर निर्भर करता है।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2011

जनमत संग्रह किस बात के लिए ?

जनमत  संग्रह  किस  बात  के लिए, मेरा अपना  घर  मेरा  है  या  पडोसिओं  की  है  इसके  ऊपर  जन मत  ? प्रशांत भूषण  अपने  बाप  की   औलाद  है  या  नहीं  इसके  ऊपर  जनमत  ? कश्मीर  हमारा  है , भारत  का  अभिछेद्य  अंग  है  इसके  ऊपर  क्यूँ  होगा  जन मत  ? देश  के  विरुद्ध  जो  अंट  संट  बकेगा  उसको  फांसी  होगा  या सम्मानित किया जायेगा  उसके  ऊपर  जनमत  होना  चाहिए .

लगता है बिच्छिन्न्तावादी और प्रशांत भूषण ये सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं. और प्रशांत भूषण घरका भेदी लंका ढाये ये इस तरह के लोग है,सरकार किसी संगठन को बेन करें या न करें लेकिन स्वाधीन अभिव्यक्त की नाम पर देश विरोधी वक्तव्य देना तथा किसी भी देशभक्त नागरिक की भावना को आहत  करना किसी का अधिकार नहीं है इस तरह की एक बिल संसद में लाने की जरुरत है,  


क्या अन्ना & टीम आतंकवाद और कश्मीर के बारे में अपनी दृष्टीकोण भारत की जनता के सम्मुख स्पस्ट करेंगे ?  

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

न अचार है न मुरब्बा है, राहुल खाली डब्बा है


न अचार है न मुरब्बा है, राहुल खाली डब्बा है

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सबसे पहले तो उत्तर प्रदेश भाजपा को बधाई कि उसने राहुल गांधी का संघ ज्ञान बढ़ाने के लिए संघ विचारधारा को समझानेवाली पुस्तकों का सेट भेजा है. मध्य प्रदेश की तीन दिवसीय यात्रा में उन्होंने जिस प्रकार से संघ को सिमी के करीब ठहरा दिया उससे साबित होता है कि संघ विचारधारा के बारे में तो उन्हें तनिक भी अंदाज नहीं है, साथ ही यह भी आभास होता है कि वे राजनीतिक रूप से टीन और कनस्टर के ऐसे खाली डिब्बे हैं जो जैसे चाहे अपने हित के लिए इस्तेमाल कर सकता है.
शायद इसीलिए राहुल बाबा जहां जाते हैं कोई न शिगूफा छोड़ ही देते हैं। इस बार मध्यप्रदेश दौरे पर आए तो आरएसएस की तुलना सिमी से कर दिया। टीकमगढ़ के दौरे पर आए राहुल ने कह दिया कि संघ और सिमी की विचारधारा को छोड़कर आने वालों को ही कांगे्रस में जगह मिलेगी। 6 अक्टूबर को राजधानी भोपाल में जब पत्रकारों ने राहुल से उनके टीकमगढ वाले बयान के बाबत पूछा तो उन्होंने कहा - आरएसएस और सिमी दोनों ही कट्टरवादी संगठन है। वैचारिक कट्टरता की दृष्टि से इनमें कोई फर्क नहीं है। यहां के लोगों में चर्चा है कि राहुल बाबा मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की बोली बोल रहे है। बोलना भी चाहिए, राहुल आखिर अपने सलाहकार की भाषा न बोले तो किसकी बोले! राहुल को कौन समझाये कि उनके शगूफे और सूर्रे से उनकी, उनकी अम्मा और पूरी पार्टी की भद्द पिट रही है। राहुल जब कांग्रेस का आत्मसम्मान ढूंढते हुए बंगाल के दोरे पर गए थे तो वहां की युवतियों ने जरूर उनके लिए सीटियां बजाई और राहुल-राहुल के नारे लगाए, लेकिन ममता बहन को वे नाराज ही कर आए थे। राहुल ने माक्र्सवाद को मरी हुई विचारधारा कह कर वहां के वामपंथियों को नाराज कर दिया था। वहां उन्होंने कम्युनिस्टों के बारे में कहा था कि - यह मृत विचारधारा हो गई है जो क्यूबा सहित पूरे विश्व में असफल हो चुकी है। माकपा महासचिव प्रकाश करात ने पलटवार करते हुए राहुल की राजनीतिक समझ पर ही सवाल खड़ा कर दिया था। करात ने कहा कि राहुल में वो राजनैतिक समझ नहीं है जो जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी में था।
संघ और सिमी से तुलना वाले बयान को लेकर राहुल फिर विवादों में घिर गए हैं। हालांकि संघ ने उनके बयान को शिगूफा मानकर हल्के में लिया और उनके बयान को हवा में उड़ा दिया। दिल्ली से लेकर भोपाल तक भाजपा ने जरूर इसे गंभीरता से लिया और जवाब देने के लिए अपने प्रवक्ताओं को आगे किया। भाजपा प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने कहा कि सब प्रकार के प्रयास करने के बावजूद राहुल गांधी का जादू चल नहीं पा रहा है, इसलिए वे अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। राहुल का यह बयान उनकी ‘राजनैतिक अपरिपक्वता, अज्ञानता और उद्दंडता’ का परिचायक है। मध्यप्रदेश के भाजपा अध्यक्ष प्रभात झा ने तो राहुल का नया नामकरण ही कर दिया। प्रभात झा ने राहुल को ‘उंटपटांग गांधी’ कह दिया। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के लिए तो राहुल बिन बुलाए मेहमान’ ‘हो गए। प्रदेश के मुखिया होने के नाते मुख्यमंत्री ने बड़प्पन दिखाते हुए राहुल को राज्य अतिथि का दर्जा दिया। लेकिन मध्यप्रदेश में राज्य अतिथि बने राहुल ‘अतिथि देवो भवः’ नहीं बन सके। अपने बयान पर उन्हें भाजपा की खरी-खोटी सुननी पड़ी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने कहा कि संघ देशभक्ति का पाठ पढ़ाने के साथ ही राष्ट्रभक्त नागरिकों को तैयार करता है। संघ की सिमी जैसे प्रतिबंधित संगठन से किसी प्रकार की तुलना उचित नहीं है।
हांलाकि संघ ने मध्यप्रदेश में राहुल के बयान को जरा-सा भी तवज्जो नहीं दिया। भोपाल में संघ पदाधिकारियों ने राहुल के बयान को उनका बड़बोलापन और नासमझी भरा बयान मान उसपर चर्चा से भी मनाही कर दी। लेकिन दिल्ली में संघ के पूर्व प्रवक्ता और केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य राममाधव ने कहा कि राहुल को निरर्थक बयानबाजी करने से पहले अपना ज्ञानवद्र्धन करना चाहिए। उन्हें संघ और प्रतिबंधित संगठनों के बीच अंतर पता होना चाहिए और कांग्रेस संगठन का इतिहास भी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पर पिछले छह दशकों से कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का आरोप लग रहा है। श्री राममाधव ने राहुल को सलाह दी कि उन्हें अभी लंबा राजनीतिक सफर तय करना है। उन्हें देश और संगठनों के बारे में बेहतर ज्ञान होना चाहिए। उन्हें और अधिक अध्ययन की जरूरत है। भोपाल से सामाजिक कार्यकर्ता बीएल तिवारी ने राहुल के बयान और कांग्रेस के रवैये पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि भैंसे के आगे बिन बजाए, भैंस रहि पगुराये। ‘‘राहुल और दिग्विजय कांग्रेस के दो भैंस हैं। इनके सामने संघ के लोग बीन क्यों बजा रहे हैं। दोनों गुरु-शिष्य देशद्रही संगठनों और विचारों का समर्थन कर रहे हैं। गौरतलब है कि पिछले दिनों उड़ीसा के दौरे पर राहुल माओवादियों के साथ मंच साझा कर चुके हैं। इसको लेकर उड़ीसा सहित पूरे देश में काफी बवाल मचा था। कश्मीर के सवाल पर उमर अब्दुल्ला का पक्ष लेकर वे पहले ही कांग्रेस की किरकिरी करा चुके हैं। राहुल से शह मिलने के बाद उमर ने पाकिस्तान समर्थक बयान दे डाला। दिग्विजय सिंह पहले ही बटला हाउस, नक्सली समस्या और हिन्दू आतंकवाद के सवाल पर अपना राष्ट्रविरोधी चरित्र उजागर कर चुके हैं। राहुल ने सिमी से संघ की तुलना कर प्रकाश करात के वक्तव्य का सही सिद्ध कर दिया है। भाजपा ने तो राहुल, दिग्विजय और कांग्रेस को राजनैतिक भाषा में जवाब दे दिया है। लेकिन संघ इस मामले पर चुप ही रहना चाहता है। शायद संघ की चुप्पी ही राहुल को जवाब हो। संघ सुर्रे और शगूफे पर अपना वक्त जाया करना नहीं चाहता। कुछ राजनेताओं को भड़काउ और आपत्तिजनक बयान देने में ही लाभ दिखता है। मुलायम, पासवान, लालू, दिग्विजय, चिदंबरम और राहुल को संघ ने अब इसी श्रेणी में रख दिया है। संभव है आने वाले दिनों में इनके बयानों पर संघ चुप ही रहे जब तक कि ये ‘राजनैतिक अपरिपक्वता, अज्ञानता और उद्दंडता नहीं छोड़ते। संघ को शायद उम्मीद है कि ऐसे नेता आज नहीं तो कल देशद्रोही और देशभक्ति की विचारधारा में फर्क समझेंगे, भले ही वो विचार कट्टर ही क्यों न हो।
ऐसे प्रकरणों से नेहरू गांधी परिवार के भावी उत्तराधिकारी के वैचारिक खोखलेपन का भी पता चलता है. मध्य प्रदेश यात्रा के दौरान दिग्विजय सिंह ने किस खास मकसद से राहुल गांधी का इस्तेमाल इस तरह का बयान दिलवाने के लिए किया यह ज्यादा बड़ा रहस्य नहीं है. लेकिन राहुल गांधी कांग्रेस के वारिस हैं. वे किसी दिग्विजय सिंह के टट्टू नहीं है जिसे जैसे चाहे दिग्विजय सिंह हांकते रहें. कम से कम बयान देते समय उन्हें इतना तो ख्याल रखना ही चाहिए उनके ऐसे बयानों से न केवल उनका खोखलापन देश के सामने आता है बल्कि कांग्रेस का भी भविष्य अंधकारमय दिखता है जो कम से संघ के लिए शुभ संकेत है.