शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता:

नारी का सम्मान सदा होना चाहिए। संस्कृत में एक श्लोक है- 'यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता: (भावार्थ- जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं।) किंतु आज हम देखते हैं कि नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है। उसे 'भोग की वस्तु' समझकर आदमी 'अपने तरीके' से 'इस्तेमाल' कर रहा है।
नारी का सबसे पवित्र रूप मां के रूप में देखने में आता है। माता यानी जननी। मां को ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है, क्योंकि ईश्वर की जन्मदात्री भी नारी ही रही है। मां देवकी (कृष्ण) तथा मां पार्वती (गणपति/ कार्तिकेय) के संदर्भ में हम देख सकते हैं इसे।
किंतु बदलते समय के हिसाब से संतानों ने अपनी मां को महत्व देना कम कर दिया है। यह चिंताजनक पहलू है। सब धन-लिप्सा व अपने स्वार्थ में डूबते जा रहे हैं। (सिर्फ) मेरी बीवी व मेरे बच्चे यही आजकल परिवार की परिभाषा रह गई है। फिर बुजुर्ग माता-पिता की सेवा कौन करे? यह सवाल आजकल यक्षप्रश्न की तरह चहुंओर पांव पसारता जा रहा है। नई पीढ़ी को आत्मावलोकन करना चाहिए।

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी इलाके में
नन की ट्रेनिंग पा रही एक लड़की पर
अपने नवजात बच्चे की गला घोंटकर
हत्या का आरोप
लगा है.सोसेफीना अमोआ नाम की इस
ट्रेनी नन को पुलिस ने बुधवार
को गिरफ्तार किया और अब उस पर
मुकदमा चल रहा है.
अमोआ 5 अक्टूबर को लिटिल सिस्टर्स
ऑफ द पुअर नाम की संस्था में नन
बनने के लिए दाखिल हुई.
उसका दर्जा ट्रेनी का था. नन ईसाई
धर्म की साध्वी की तरह होती हैं और
उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन
करना होता है. मगर अमोआ यहां आने
से पहले ही गर्भवती थी और उसने अपने
अफेयर या इस बारे में
किसी को नहीं बताया. 10 अक्टूबर
को चर्च के ही बुजुर्गों की केयर करने
वाले सेंटर के एक कमरे में नन ने बेटे
को जन्म दिया. उसका नाम
रखा गया जोसेफ. अमोआ
को लगा कि जोसेफ के रोने की आवाज
से देर सवेर उसका भेद खुल जाएगा.
तो उसने एक दिन जोसेफ नाम के उस
बच्चे का गला ऊनी कपड़े से घोंट दिया.
फिर अगले दिन उसने अपनी एक
सहेली नन को बताया कि ये बच्चा हिल
डुल नहीं रहा है. नन ने देखा का शरीर
नीला और ठंडा पड़ा हुआ है. वे उसे
अस्पताल ले गए. यहीं से उसकी पोल
खुलनी शुरू हुई.

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

बीमारी = कंग्रेस

कंग्रेस और केन्सर
कंग्रेस और टीवी
कंग्रेस और डाइवेटिस
कंग्रेस और लेप्रोसी
कंग्रेस और किडनी फेयल्युर
कंग्रेस और हार्ट प्रोवलेम
कंग्रेस और लिवर प्रोवलेम
कंग्रेस और मलेरिया
कंग्रेस और फाइलेरिया
कंग्रेस और अन्यान्य बिमारियाँ....
जैसे उपरोक्त सभी बिमारियाँ मनुष्य शरीर को धिरे धिरे नष्ट कर देता है वैसे ही ये कंग्रेस रुपी बिमारी  देह रुपी देश को नष्ट कर रहा है... जैसे सतर्कता अवलम्बन करते हुए बिमारियों को दुर किया जा सकता है वैसे ही  यह कंग्रेस रुपी बिमारी को भी दूर किया जा सकता था लेकिन हम लोग सतर्कता अवलम्बन न करने के कारण उस बिमारी का फल भुगत रहे हैं... अभी भी समय है अगर अभी भी हम सतर्क हो जाएँगें तो कंग्रेस रुपी बिमारी से भारत माता को बचाया जा सकता है .... जागो मित्रों जागो । ।।

सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

बिश्वेश्वरी वन्दना ...

बिश्वेश्वरी त्वं परीपासी  बिश्वं
बिश्वात्मीका धाररसीति बिश्वम् ।।
बिश्वेशबन्द्या भबती भवन्ति
बिश्राश्रयाये  त्वयि भक्ति नम: ।।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

"भारत माता"



  हिमालयं समारम्भ्य् यावत् इन्दु सरोवरं
   तददैव निर्मितं देशं  हिन्दुस्थान प्रचक्षते

        हिन्दुस्थान इसका भौगलिक नाम है। अपने स्थान और विश्व के भरण  पोषण की सामर्थ्य के कारण, अपनी सभ्यता और संस्कृति के कारण, अपने प्रभाव और उत्कर्ष के कारण इसका नाम हुआ भारत (भ +आ +र +त) ज्ञान  मे रत तथा ज्ञान का प्रकाश बिखरने वाला, विश्व को भरण पोषण करने  वाला भारत।  इस देश के महान् पुत्र हुए भरत और उनकी "माँ" के रूप में यह धरती हुई "भारत माता" ।

        इस देश की सत्ता तो बदलती रही है लेकिन देश की स्वरुप नहीं बदला। समाज नहीं बदला।  सम्बन्ध नहीं बदला। सदैव एक इकाई रहा।  इसीलिए आज भी  इसी एक इकाई की प्राकृतिक प्रवाह  शक्ति  सीमाओं को नकारती हुई गतिवान है। अवरोध जो कृत्रिम है, किसी भी क्षण ध्वस्त हो सकती है।  इकाई की  चेतना जीवन्त है और सक्रीय है।

       भारत सोने की  चिड़िया कहा जाता था।   सम्पन्नता का घर था। लूटने के बाद भी आज कंगाल नहीं है।   हमारी समझ समझ अपनी आँख नहीं रखती।  विदेश की आँख से देखना उसे भाता है।  अपनी नहीं विदेश की क्रूर दृष्टि उसे अच्छी लगती है। इसीलिए अपनी सुन्दरता और सम्पन्नता नहीं, विदेश की विपन्नता और विकृति उसे भाति है।  पूछिए इन विद्वानों से, क्या हिमाद्रि की  बर्फीली चट्टानों  पर खोज की चरण  पहुंचे हैं ? क्या सागर के स्रोतों तक दृष्टि दौड़ाई है ? क्या मैदानों में पर्तों के निचे झांका है ? क्या मध्यप्रदेश, छातीशगड, ओडिशा,बिहार और आँध्रप्रदेश के जंगली कक्षेत्रो पर पसीने की बुँदे बही है ? क्या  राजस्थान की बालू  तले गहरे पैठने का प्रयास किया है ? यदि नहीं तो क्यूँ ? भारत मिटटी के तेल पर तैर रहा है।  गंगा और यमुना से भी बड़ा मीठे जल का प्रवाह धरा के निचे बह रहा है। औषोधियो और खनिज का भण्डार है हिमालय।  अपरिमित जल शक्ति, ज्वार और लहरों के रूप में बिद्यमान है।   सौर की कभी न  समाप्त होने वाली ऊर्जा है।  अणु शक्ति का, यूरोनियम से लेकर थोरियम तक विशाल भण्डार है।  खनिज का अपार भण्डार है।  खादयान्न और वस्त्र का कोई अभाव नहीं। गेहूं हो या चावल, गन्ना हो या चाय, कपास हो या जुट, भारत विश्व में किससे  पीछे है ? बस हमारी बुद्धि, हमारा श्रम, हमारी समझ और और हमारा साहस, हमारी हीन भावना और परानुकरण, हमारे हाथ और पैर पंगु बना देते हैं। हम धनि देश के निर्धनवासी बन कर रह गए हैं।

















      

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

" वन्दे मातरम "

     

 प्रत्येक की ललक माँ की गोद में जा आनन्द से बैठ किलकने की है। माँ  समर्थवान और सुख देने वाली  हो तो फिर इस ललक की तृप्ति को कहना ही क्या। भारत माँ केवल भारत के लाडले सुतों को ही प्यार नहीं लुटाती वह तो विश्व को प्यार में बाँध लेती है।  ऐसी प्यार लूटाने वाली माँ को पाकर कौन धन्य नहीं होगा।  मनुष्य की तो बात छोड़े देवता भी इस माँ की गोद में बैठने के लिए बेचैन मिलते हैं।  एक क्षण भी इस धरती पर  बिता दिया तो बर्षों का पुण्य मिल जाता है। नर से नारायण बनाने वाली यह धरती भारत है।
   
       इसकी वन्दना हमें सुख देती है। इसकी अर्चना हमें शक्ति देती है। इसका पल पल स्मरण हमें एक शक्ति में बाँध विराट रूप में खडा रखता है।  " माता भूमि पुत्रॊहम् पृथिव्या ' कह इसीलिए हम सदैव से स्मरण करते आए हैं, पूजते आए हैं। इसकी प्रशंसा में गीत गाए हैं आचरण में इसे समाए हैं। जब भूले तो गहरे गर्त में खो गए। माँ को बिस्मरण कर देना पुत्र को कब फलेगा ! दासता के कालखण्ड में हमारी दुर्गति हुई, इसीलिए कि हम माँ को भूल बैठे।  असहनीय पीड़ा से, जन-जन की बेदना से,आतंक और  अत्याचार के कोड़ों से बहे रचा के दर्द से, जो माँ के लिए पुकार उठी, वह"वन्दे मातरम" बन सामने आई। यह पुकार गीत नहीं संगीत बन गई। राष्ट्र  आन्दोलन बन गई। फांसी के फंदे से लेकर सिने पर गोली तक, जिसने पुत्रों को साहस से डिगने न दिया, चूम लिया हँसते-हँसते फांसी का फंदा और बोले " वन्दे मातरम ", ली सिने पर गोली और पुकार उठे             " वन्दे मातरम "

          "वन्दे मातरम् "  मन्त्र   है और इसका  स्तवन है, गान और "सुजलां  शुफलां " शव्दों में बंधा गीत का रूप। अपने में समर्थ और पूर्ण है। आज भी इस मन्त्र की वही शक्ति है, जो इसके जन्म के समय थी। भारत की एकता और भारत की अखण्डता का एक मात्र  सूत्र है " वन्दे मातरम् " भारत को विश्व शक्ति में बदल, विश्व को सुख, सम्पन्नता और शक्ति का रास्ता है "वन्दे मातरम" प्राण है हमारा और शक्ति है हमारी। इसके लिए बहा रक्त, इसकी शक्ति का प्रमाण है और आज भी मचलती आतुरता इसके आकर्षण का प्रभाव है।   
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      हम इसे गाएँ ही नहीं, स्वर - स्वर में समा लें । भारत निकल पड़े, इस गीत के स्वरों के साथ।  धो डालें कलंक, जो इसे छांट कर हमने लगाया। प्रायश्चित कर डालें अपने अतीत के दुष्कर्मों का, जो हमने इसे  भुलाया। राष्ट्र गान का सहज रूप बन, गाँव - गाँव -गली गली गूँज उठे और भारत अखण्ड  बने।  यह होगा, नियति है।    " वन्दे मातरम "

गुरुवार, 22 अगस्त 2013

तुलनात्मक सामाजिक रचनाएं - दृष्टिकोण के अंतर

आज  की परिस्थिति मे  विचारो की समग्रता का अभाव कितना विनाशकारी हो सक्ता है यह  समझ्ना कठिन नही है .पश्चिम से प्रभावित होकर हम अपने निजी दर्शन को भूल गये . वास्तव मे आज पश्चिम के विचारक मार्गदर्शन के लिए भारत की  ओर देख रहे हैं और हम पश्चिम का अंधानुकरण करने के प्रयास में हैं .कैप्रा के सामान कई विचारको को लग रहा है कि " नक्षत्रों की तरह चलायमान वर्त्तमान व्यवस्था के रूप में  हम परावर्तन के बिंदु पर पहुँच गए हैं. वर्तमान संकट रोम की पुराणी राजतंत्री संस्कृति से आधुनिक युग में प्रवेश की संक्रमण अवस्था के कारण है ". इस मोड़ पर पश्चिम को सही दिशा दिखाने की क्षमता सनातन धर्म तथा उनके युगानुकुल आविष्कार के रूप में एकात्म मानव दर्शन में ही है . इस दर्शन को ठीक ढंग से समझ लिया तो राष्ट्र का सम्पूर्ण स्वरुप कैसे रहे, यह ध्यान में आ सकता है . 
इस दृष्टि से केवल संकेत के नाते कुछ प्रमुख बातें निम्न तालिका में बताई गई है अर्थात यह केवल दिशा-दर्शन है . किन्तु इसके आधार पर आगे की कल्पना कोई भी विचारक कर सकता है .   

                                  तुलनात्मक सामाजिक रचनाएं - दृष्टिकोण के अंतर 


पक्ष                                   पूंजीवाद                साम्यवादी                                              हिन्दू चिंतन 
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दर्शन                                भौतिकवाद            भौतिकवाद                                          एकात्ममानव दर्शन 
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मनुष्य का रूप                आर्थिक प्राणी         आर्थिक प्राणी                                     देह,मन,बुद्धि, आत्मा 
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लक्ष             व्यक्ति की भौतिक सम्पन्नता,   राज्य की भौतिक सम्पन्नता,   व्यक्ति का धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष
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नमूना          क्लव जीवन                               मशीनी जीवन                                       मानव शारीर 
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अनुशासन   व्यक्ति को उछ्रुन्खला की सीमा-  शासकीय अनुशासन,                     उच्छ्रुन्खलता रहित                                                          व                     तक छुट                               अनुशासन,                                       स्वतन्त्रता तथा वैचारिक                                        स्वतन्त्रता                                               से वैचारिक आबंधता                         आबद्धता रहित अनुशासन 
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संपत्ति का        अनियंत्रित                       कोई अधिकार नहीं                      आवश्यकता पर आधारित न्यूनतम    
अधिकार                                                                                                                    यावाद्भ्रियेत जठरं )   
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कार्य पद्धति         शोषण                         शासन द्वारा शनै शनै जव्ती                        यज्ञ,दान 
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प्रमुख भाव        व्यक्तिवाद                      राज्य सत्तावाद                                       अन्गांगीभाव
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प्रक्रिया            स्पर्धा की भावना                   जबरदस्ती                                               सहयोग 
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ढांचा                बहुदलीय जनतंत्र             एकदलीय तानाशाही                                     धर्मराज्य 
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श्रम के अधिक    मालिक                         राज्य                                                              समाज                   
मुल्य का 
मालिक कौन  
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रोजगार व्यवस्था    रिक्त स्थानानुसार       राज्य निर्देशित                                         प्रबृत्ति अनुसार  
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विचार प्रक्रिया         खंडात्मक                      खंडात्मक                                                समग्र  
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