बुधवार, 21 अगस्त 2013

वेद क्या हैं?

















वेद मानव सभ्यता के लगभग सबसे पुराने लिखित दस्तावेज हैं! वेद ही हिन्दू धर्म के सर्वोच्च और सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं!  सामान्य भाषा में वेद का अर्थ है "ज्ञान" ! वस्तुत: ज्ञान वह प्रकाश है जो मनुष्य-मन के अज्ञान-रूपी अन्धकार को नष्ट कर देता है ! वेदों को इतिहास का ऐसा स्रोत कहा गया है जो पोराणिक ज्ञान-विज्ञानं का अथाह भंडार है ! वेद शब्द संस्कृत के विद शब्द से निर्मित है अर्थात इस एक मात्र शब्द में ही सभी प्रकार का ज्ञान समाहित है ! प्राचीन भारतीय ऋषि जिन्हें मंत्रद्रिष्ट कहा गया है, उन्हें मंत्रो के गूढ़ रहस्यों को ज्ञान कर, समझ कर, मनन कर उनकी अनुभूति कर उस ज्ञान को जिन ग्रंथो में संकलित कर संसार के समक्ष प्रस्तुत किया वो प्राचीन ग्रन्थ "वेद" कहलाये ! एक ऐसी भी मान्यता है कि इनके मन्त्रों को परमेश्वर ने प्राचीन ऋषियों को अप्रत्यक्ष रूप से सुनाया था! इसलिए वेदों को श्रुति भी कहा जाता है । 
           इस जगत, इस जीवन एवं परमपिता परमेशवर; इन सभी का वास्तविक ज्ञान "वेद" है!


वेद क्या हैं?

            वेद भारतीय संस्कृति के वे ग्रन्थ हैं, जिनमे ज्योतिष, गणित, विज्ञानं, धर्म, ओषधि, प्रकृति, खगोल शास्त्र आदि लगभग सभी विषयों से सम्बंधित ज्ञान का भंडार भरा पड़ा है ! वेद हमारी भारतीय संस्कृति की रीढ़ हैं ! इनमे अनिष्ट से सम्बंधित उपाय तथा जो इच्छा हो उसके अनुसार उसे प्राप्त करने के उपाय संग्रहीत हैं ! लेकिन जिस प्रकार किसी भी कार्य में महनत लगती है, उसी प्रकार इन रत्न रूपी वेदों का श्रमपूर्वक अध्यन करके ही इनमे संकलित ज्ञान को मनुष्य प्राप्त कर सकता है !

वेद मंत्रो का संकलन और वेदों की संख्या 
            ऐसी मान्यता है की वेद प्रारंभ में एक ही था और उसे पढने के लिए सुविधानुसार चार भागो में विभग्त कर दिया गया ! ऐसा श्रीमदभागवत में उल्लेखित एक श्लोक द्वारा ही स्पष्ट होता है ! इन वेदों में हजारों मन्त्र और रचनाएँ हैं जो एक ही समय में संभवत: नहीं रची गयी होंगी और न ही एक ऋषि द्वारा ! इनकी रचना समय-समय पर ऋषियों द्वारा होती रही और वे एकत्रित होते गए !
           शतपथ ब्राह्मण के श्लोक के अनुसार अग्नि, वायु और सूर्य ने तपस्या की और ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को प्राप्त किया !
प्रथम तीन वेदों को अग्नि, वायु और सूर्य से जोड़ा गया है ! इन तीनो नामों के ऋषियों से इनका सम्बन्ध बताया गया है, क्योंकि इसका कारण यह है की अग्नि उस अंधकार को समाप्त करती है जो अज्ञान का अँधेरा है ! इस कारण यह ज्ञान का प्रतीक मन गया है ! वायु प्राय: चलायमान है ! उसका कम चलना (बहना) है ! इसका तात्पर्य है की कर्म अथवा कार्य करते रहना ! इसलिए यह कर्म से सम्बंधित है ! सूर्य सबसे तेजयुक्त है जिसे सभी प्रणाम करते हैं ! नतमस्तक होकर उसे पूजते हैं ! इसलिए कहा गया है की वह पूजनीय अर्थात उपासना के योग्य है ! एक ग्रन्थ के अनुसार ब्रम्हाजी के चार मुखो से चारो वेदों की उत्पत्ति हुई !

१. ऋग्वेद 
ऋग्वेद सबसे पहला वेद है। इसमें धरती की भौगोलिक स्थिति, देवताओं के आवाहन के मंत्र हैं। इस वेद में 1028 ऋचाएँ (मंत्र) और 10 मंडल (अध्याय) हैं। ऋग्वेद की ऋचाओं में देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियाँ और देवलोक में उनकी स्थिति का वर्णन है।
२. यजुर्वेद 
यजुर्वेद में यज्ञ की विधियाँ और यज्ञों में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्वज्ञान का वर्णन है। इस वेद की दो शाखाएँ हैं शुक्ल और कृष्ण। 40 अध्यायों में 1975 मंत्र हैं।
३. सामवेद 
साम अर्थात रूपांतरण और संगीत। सौम्यता और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं (मंत्रों) का संगीतमय रूप है। इसमें मूलत: संगीत की उपासना है। इसमें 1875 मंत्र हैं
४. अथर्ववेद 
इस वेद में रहस्यमय विद्याओं के मंत्र हैं, जैसे जादू, चमत्कार, आयुर्वेद आदि। यह वेद सबसे बड़ा है, इसमें 20 अध्यायों में 5687 मंत्र हैं।





सोमवार, 6 मई 2013

चीन के पास आई तबाही की चाभी



चीन के पास आई तबाही की चाभी

पहले चारों तरफ से भारत को घेरने की कोशिश, पड़ोसियों के साथ मिलकर हमें तबाह करने की साजिश और अब पानी को बनाया गया हमारे खिलाफ हथियार. जी हां, एक ऐसा हथियार, जिससे न तो धमाके होंगे, न ही इसकी आहट किसी को सुनाई देगी. बस एक चाभी घुमाने भर की देर है, हम तड़पने लगेंगे.  यानी हमारी जान बसी है उसी चाभी में और वो चाभी है चीन के पास.

काफी दिनों से चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने में लगा था. मंशा इसके पानी को मोड़ने के अलावा और भी है. बांध बनकर तैयार है और अब हमारे पूरे नॉर्थ-ईस्ट में चीन जब चाहेगा, तब सूखा ला सकता है. साथ ही जब उसका मन हुआ, तो भयानक बाढ़ लाना भी उसके लिए चुटकी बजाने भर का खेल होगा. यानी दोनों ही हालत में तबाही ही तबाही. इसके लिए उसे करना कुछ भी नहीं है. बांध बनाकर चीन ने पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले लिया है.
जैसे ही बांध बनने की सेटेलाइट तस्वीर सामने आई, भारत ने जोरदार विरोध किया. इस मसले पर चीन के साथ कई दौर की बातचीत भी हुई. चीन के इस आश्वासन पर कि वह पानी के बहाव को नहीं रोकेगा, भारत मान गया. लेकिन क्या चीन इतना भरोसा किए जाने के लायक है? जो उसकी हरकतें हैं, उसे देखकर तो कतई नहीं. ये न सिर्फ सरकार, बल्कि हर भारतीय बखूबी जानता-समझता है. इसके बावजूद भारत सरकार ने चीन की बातों पर इतनी आसानी से यकीन कैसे कर लिया? विरोध के साथ-साथ इसे रोकने के लिए चीन पर दबाव क्‍यों नहीं बनाया गया? एक तरफ हम बातचीत करते रहे और दूसरी तरफ हमें बातों में उलझाकर चीन अपना काम करता रहा.
एक चीज हम भूल गए हैं कि बातचीत महज एक जरिया हो सकती है, हथियार नहीं. वह भी उस हालत में तो बातचीत का कोई मतलब ही नहीं बनता, जब सामने वाला हर मसले का हल जोर-जबरदस्ती अपने तरीके से चाहता हो. चलिए कुछ पल के लिए मान लेते हैं कि चीन पानी के बहाव को नहीं रोकेगा, लेकिन कब तक? तभी तक न, जब दोनों देशों के बीच संबंध  अच्छे रहेंगे. लेकिन संबंधों में खटास पड़ते ही कोई हमारी फिक्र क्यों करेगा? अगर जंग जैसे हालात पैदा होते हैं या जंग छिड़ती है, तो फिर किसी बातचीत या आश्वासन की गुंजाइश कहां बचती है. ऐसे में भारत क्या करेगा? बस मूक बनकर तबाही देखेगा? सरकार जो भी कहे, लेकिन मेरी राय में तो ये चाभी एक न एक दिन विनाश लाएगी ही.

1975 :

1975 : भारत में आपातकाल लागू

इंदिरा गाँधी
आपातकाल के बाद 1977 के आम चुनावों में कांग्रेस की बुरी तरह से हार हुई थी
वर्ष 1975 में इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की सलाह पर भारत के राष्ट्रपति फ़खरुद्दीन अली अहमद ने देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की थी.
आपातकाल लागू करने के साथ ही देश में लोगों के तमाम जनतांत्रिक और मूलभूत अधिकार निलंबित कर दिए गए थे. इसके अलावा अख़बारों और समाचार के सभी माध्यमों के ऊपर सेंसरशिप लागू कर दी गई थी.
देश के सभी विपक्षी दलों के नेताओं जैसे अटल बिहारी वाजपेयी, जयप्रकाश नारायण, जॉर्ज फर्नांडिस, जेबी कृपलानी, और चरण सिंह सहित कई लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया था.
सरकार ने देश में आपातकाल का कारण घोर आतंरिक अस्थिरता बताया था.
राजनीतिक विश्लेषक इस आपातकाल के पीछे इलाहबाद हाईकोर्ट के उस निर्णय देखते हैं जिसमें इंदिरा गांधी के रायबरेली से चुनाव को रद्द कर उन्हें छह साल के लिए चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य करार दे दिया गया था.
ये आपातकाल जनवरी 1977 में जा कर समाप्त हुआ. प्रख्यात गांधीवादी विनोबा भावे ने इस आपातकाल का समर्थन किया था और इसे अनुशासन पर्व कहा था

बुधवार, 24 अप्रैल 2013



 पाकिस्तान में पाणिनि की जयंती हर साल मनाई जाती है । कारण क्या ? 
जो भूभाग "पाकिस्तान " नाम से पहचाना जाता है, वहां पाणिनि का जन्म हुआ था । यदि  पाकिस्तानी लोग 
"पाणिनि हमारे श्रेष्ठ पूर्वजों में से एक है" ऐसा गर्व के साथ कहते हैं, तो फिर भारत के अपने " मुसलमान" बंधू भी पाणिनि,व्यास,वाल्मीकि,राम और कृष्ण सब अपने ही श्रेष्ठ पूर्वज है ऐसा अभिमान पूर्वक क्यूँ नहीं कहते ???   हिन्दुओं में भी ऐसे अनेक लोग हैं जो कि राम,कृष्ण,आदि को इश्वर का अवतार नहीं मानते । किन्तु वे भी उनको श्रेष्ठ पुरुष मानते हैं । इसीलिए मुसलमानों ने उनको "अवतारी पुरुष"नहीं माना तो भी कुछ बिगड़ता नहीं है । किन्तु क्या मुसलामानों ने उनको अपना  राष्ट्र-पुरुष भी नहीं  मानना चाहिए ? हमारे धर्म और तत्वज्ञान की शिक्षा के अनुसार हिन्दू और मुसलमान दोनों समान ही है । ईश्वरीय सत्य का साक्षात्कार केवल हिन्दू ही कर सकते है,ऐसा नहीं है । अपने-अपने धर्ममत के अनुसार आचरण करते हुए कोई भी साक्षात्कार प्राप्त कर सकता है । हम सबका भारतीयकरण करण होना चाहिए । 
हिन्दुओं और मुसलमानों ने परस्पर के त्योहारों में भाग क्यूँ नहीं लेना चाहिए ? समाज के सभी स्तरों के लोगों को अतीव उल्लास के वायुमंडल में एकत्रित लाने वाला होलिकोत्सव है । मानो,इस होलिकोत्सव में एकाध मुस्लिम बंधू के बदन पर किसी ने थोडा रंग उड़ाया तो क्या उतने से ही कुरान की सब आज्ञाओं  का  उल्लंघन हो जाता है ? इस बात की ओर उन्होंने एक सामाजिक व्यवहार इस नाते देखना चाहिए । आप मेरे ऊपर रंग डालिए,मैं आपके ऊपर रंग डालता हूँ । हमारे लोग तो कई वर्षों से मोहर्रम के सभी कार्यक्रमों तथा जुल्सों में सहभागी होते आए हैं । इतना ही नहीं,  अजमेर उर्स जैसे अन्य त्योहारों में भी मुसलमानों की बराबरी से हमारे लोग भी उत्साह में भाग लेते हैं । किन्तु यदि कल हमने कुछ मुस्लिम  बन्धुओ को हमारी सत्य-नारायण पूजा में भाग लेने के लिए निमंत्रण किया, तो क्या होगा ?
भारतीयकरण का मतलब सभी को हिन्दू बनाना नहीं है । हम सब इस भूमि की संतान है, यह सत्य हम सभी ने समझ लेना चाहिए और इस सत्य पर अविचल निष्ठा रखना चाहिए । हम सब एक ही मानव समूह के हैं,हम सबके पूर्वज एक ही थे और इस कारण हम सब की आकांक्षाएं भी एक ही है,  यह हमने समझ लेना चाहिए । यही भारतीयकरण का सही सही अर्थ है । 
भारतीयकरण का अर्थ यह नहीं है कि किसी ने अपनी पूजा-पद्धति का त्याग करना चाहिए । हिन्दू धर्म शास्त्र कभी ऐसा कहेगा भी नहीं । हमारी श्रद्धा है कि एक ही उपासना पद्धति सम्पूर्ण मानवजाती के लिए सुविधाजनक भी नहीं है ।  




"INTELLECTUAL" एक नयी जाती




हमारे देश में हजारों जातियां है | इन दिनों उनमें और एक नयी जाती की बृद्धि हुई है | यह नयी जाती है बुद्धिजीविओं ( INTELLECTUALS ) की | इन लोगों को बुद्धिजीवी (INTELLECTUAL) होने का प्रमाण पत्र किसने दिया, देश की सम्पूर्ण बौद्धिकता का एकाधिकार इन्हें किस प्रक्रिया से प्राप्त हुआ इसकी जानकारी किसीको नहीं है | किन्तु यह सच है कि इन बुद्धिजीविओं ( INTELLECTUAL ) ने यह मान लिया है कि देश में उपलब्ध बुद्धिमानी पर पूरी तरह से इनकी जाती का ही स्वामित्व और इस जाती के बाहर विद्वता का अकाल   व्याप्त है |
इस जाती में कुछ लोग ऐसे भी है जो प्रामाणिक है | जिनका प्रयास सत्य की खोज करने का ही रहता है और अन्वेषण के पश्चात उनको यदि प्रतीत हुआ कि नए तथ्य के प्रकाश में उनकी कुछ धारणाये गलत है तो उस बात को मान लेने, अपनी गलत धारणाओं का त्याग करने और नयी धारणाओं को स्वीकार करने में उन्हें  संकोच नहीं होता | क्यूंकि वे    सत्य के पुजारी होते हैं, अतएव पूर्वग्रहदोष से मुक्त हुआ करते हैं | किन्तु ऐसे प्रामाणिक विचार वालों को अधिक प्रसिद्धि नहीं मिलती  | इसका कारण यह है कि प्रचार के माध्यम जिनके नियंत्रण में है, प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए उनके निहित स्वार्थ से मेल खाने वाले निष्कर्ष प्रकाशित करने की  चतुराई इन प्रामाणिक विचारवानो के पास नहीं है | बुद्धिजीविओं की इस नयी जाती में अधिकतर संख्या चतुर लोगों की है ।  उनकी रूचि वास्तविक सत्य में नहीं है । चतुर होने के कारण वे पहले ही भांप लेते हैं कि प्रचार -माध्यमो के मालिकों के निहित स्वार्थों के साथ मेल खाने वाला निष्कर्ष निकालने तथा प्रकाशित करने से अपना व्यक्तिगत निहित स्वार्थ भी सिद्ध हो सकता है | इन अप्रमाणिक विचारवानों के पास इसकी ठीक जानकारी रहती है कि रोटी की किस तरफ मक्खन लगा हुआ है और यह बात वे पहले से ही तय करके रखते हैं कि तदनुसार निष्कर्ष ही निकालना है | अब प्रश्न इतना ही रहता है कि इस तरह के उपलव्ध तथ्यों की रचना किस तरह की जाए कि निष्कर्ष वे ही निकल सकें | इस कला में ये विचारवंत लोग निष्णांत बन चुके हैं | क्यूंकि यह कला ही उनका पेशा, उनकी उपजीविका का साधन तथा प्रसिद्धि एवं प्रतिष्ठा का आधार है | इस तरह की विचार-प्रक्रिया को अंग्रेजी में HYPOTHETICAL (हाइपोथेटिकल ) संज्ञा प्रदान की गई है |
व्यवहार चतुर लोगों के बिषय में कहा गया है कि- " अर्थातुरानां न पिता न बन्धु"
उपरिनिर्दिष्ट अप्रमाणिक विचारवंत लोग इस श्रेणी में आते हैं |  

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

जय जय श्री राम .............

         महापावन पर्व श्री राम नवमी का शुभ अभिनन्दन स्वीकार करें ................जय जय श्री राम

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बुधवार, 27 मार्च 2013

रंगीन पर्व होली की शुभ अवसर पर अनेक अनेक हार्द्धिक शुभेच्छाएं ......

  स्नेह,प्रेम और मैत्री का रंगीन पर्व होली की शुभ अवसर पर अनेक अनेक हार्द्धिक शुभेच्छाएं ............

होली आई सतरंगी रंगों की बौछार लायी 
ढेर सारी मिठाई और मीठा मीठा प्यार  लायी,
आप की जिंदगी हो मीठे प्यार और खुसिओं से भरी 
जिसमें समाये सातों रंग यही शुभ कामनाएं है हमारी ............
रंगों के त्यौहार में सभी रंगों की हो भरमार
ढेर सारी खुसिओं से भरा हो आप का संसार, 
यही प्रार्थना है भगवान् से हमारी हर बार 
होली की शुभकामनाएं
हो मेरे यार ......................